अक्षय तृतीया और आयुर्वेद का संबंध
- डॉ राजेश बतरा
अक्षय तृतीया, जिसे 'आखा तीज' भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह एक अत्यंत पवित्र और शुभ दिन माना जाता है, जिस दिन कोई भी कार्य प्रारंभ करना अत्यंत फलदायक होता है। इस दिन का विशेष महत्व धार्मिक, आध्यात्मिक, और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से तो है ही, साथ ही इसका गहरा संबंध आयुर्वेद और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
अक्षय तृतीया का आयुर्वेद से संबंध
वैशाख माह को आयुर्वेद में ऋतु परिवर्तन का समय माना गया है, जब ग्रीष्म ऋतु प्रारंभ होती है। यह मौसम शरीर में वात, पित्त और कफ दोषों के संतुलन को प्रभावित करता है। आयुर्वेद के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु में शरीर की अग्नि (पाचन शक्ति) मंद पड़ जाती है, जिससे पाचन तंत्र कमजोर हो सकता है। ऐसे में शरीर को शीतलता और ऊर्जा प्रदान करने वाले खाद्य एवं जीवनशैली की आवश्यकता होती है।
अक्षय तृतीया के दिन पारंपरिक रूप से जो आहार लिए जाते हैं, जैसे जौ (यव), चने, खस-खस, बेल का शरबत, आम का पना, और ठंडी चीजें, वे सभी आयुर्वेद के अनुसार पित्त शमन करने वाले होते हैं। इनका सेवन शरीर में शीतलता बनाए रखता है और गर्मियों में होने वाली बीमारियों जैसे लू, डिहाइड्रेशन, और पाचन विकारों से रक्षा करता है।
इस दिन के आयुर्वेदिक परंपराएं:
गंगा स्नान और शरीर शुद्धि: अक्षय तृतीया पर गंगा स्नान का विशेष महत्व है। आयुर्वेद में स्नान को शरीर की शुद्धि का एक आवश्यक अंग माना गया है, जो त्वचा विकारों को दूर करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।
दान और उपवास: इस दिन उपवास और सात्विक भोजन का महत्व है। उपवास से पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर से विषाक्त तत्वों (toxins) का निष्कासन होता है, जिसे आयुर्वेद 'आम दोष' कहता है।
घृत और शीतल औषधियों का प्रयोग: इस दिन गाय के घी, गुलकंद, बेल फल, शीतल जल, और त्रिफला जैसे शीतल प्रभाव वाली औषधियों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
स्वर्ण और औषधीय धातुओं का महत्व: अक्षय तृतीया पर स्वर्ण खरीदने की परंपरा है। आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म का प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और मानसिक स्फूर्ति के लिए किया जाता है। यह दर्शाता है कि स्वर्ण सिर्फ एक धातु नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है।
निष्कर्ष
अक्षय तृतीया केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह आयुर्वेद और स्वास्थ्य विज्ञान से भी गहराई से जुड़ी हुई है। इस दिन की परंपराएं और आहार-विहार नियम आयुर्वेद के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जो शरीर और मन दोनों की शुद्धि एवं संतुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसलिए, अक्षय तृतीया न केवल ‘अक्षय पुण्य’ का दिन है, बल्कि यह स्वस्थ जीवनशैली की ओर एक कदम बढ़ाने का भी अवसर है।
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