Monday, October 27, 2025

परम संत बलजीत सिंह जी महाराज : एक पूर्ण सतगुरु

परम संत बलजीत सिंह जी महाराज : एक पूर्ण सतगुरु
  जीवन-परिचय व पृष्ठभूमि 
परम संत बलजीत सिंह जी महाराज वर्तमान में Vishwa Manav Ruhani Kendra (नवाँ नगर, कलका/पंचकूला क्षेत्र) के प्रमुख संत एवं मार्गदर्शक हैं। VMRK का मुख्यालय नवान-नगर (पोस्ट ऑफिस नानकपुर, तहसील कालका, जिला पंचकूला, हरियाणा) स्थित है। 
परम संत बलजीत सिंह जी महाराज ने ग्रामीण भारत में जन्म-श्रुति पाई और बाल्यकाल से ही जीवन के गहरे अर्थ-अन्वेषण की प्रवृत्ति उनमें दिखाई दी। उन्होंने इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि से भी ‘मेरचेंट नेवी’ में कार्य किया, फिर बाद में पूर्ण-समर्पण के साथ सेवा-धारा में चले गए। 
संगठन-कार्य एवं सामाजिक-सेवा 
उनका जीवन सरलता, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति के प्रति समर्पित रहा है। सामाजिक और धर्म-पर सेवा-कार्य के माध्यम से उन्होंने मानवता-सेतु का कार्य किया है।
उनके आश्रम एवं केन्द्र में अनेक भक्त एवं साधक आते-जाते रहते हैं, जहां निस्वार्थ सेवा, ध्यान-साधना और सामाजिक कल्याण-कार्य चल रहे हैं। इस संगठन के 259 से अधिक ‘मानव-केंद्र’ पूरे भारत में कार्यरत हैं, जो नि:शुल्क भोजन-शिक्षा- सामाजिक-सेवा, चिकित्सा-राहत, आपदा राहत आदि कार्यों से मानवता की सेवा कर रहे हैं । उदाहरण के लिए, Amarnath Yatra 2025 के दौरान VMRK ने बाल्टाल एवं पहलगाम मार्गों पर चिकित्सा-शिविर स्थापित कर 1,500 से अधिक तीर्थयात्रियों का दैनिक उपचार किया। 
आध्यात्मिक आयाम एवं उपदेश-संपर्क 
संतजी के दर्शनात्मक उपदेश उस त्यौहार में उभर कर आते हैं जहाँ भक्ति-साधना, आत्म-अनुभव, गुरु-शिष्य संबंध, प्रेम-सेवा के मूल भाव प्रमुख रूप से सामने आते हैं। 
एक उद्धरण के अनुसार, “It is important that you develop in-depth and heartfelt devotion within your heart. In the end, this is what will be considered.” — संतजी द्वारा नवरात्रि के अवसर पर। 
उनकी सेवा- केन्द्र और केन्द्र के सामाजिक-धार्मिक कामों से यह स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य सिर्फ निजी मोक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि “मानव सेवा = ईश्वर सेवा” के मूल मंत्र के आधार पर व्यापक सामाजिक आध्यात्मिक परिवर्तन है। वो एक पूर्ण सतगुरु के रूप में जीवों को संसार सागर से पार करने आए हैं।
उनकी प्रेरणा स्रोत रही उस वचन-पंक्ति से- “God is Love”-जो उनके अनुशासन-साधना की चिंगारी बनी। 
उत्सव का आयोजन एवं प्रमुख गतिविधियाँ
VMRK हर वर्ष वसंत (चैत्र) एवं शरद (अश्विन) नवदुर्गा-नवरात्रि में बड़े पैमाने पर आयोजन करता है। 
उदाहरण के लिए, चैत्र नवरात्रि 2025 के लिए 30 मार्च से 6 अप्रैल तक Nawan Nagar  केंद्र में आयोजित हुआ था। 
आयोजन स्थल पर मुख्यतः शाम के कार्यक्रम होते हैं: भजन-कीर्तन, आरती, श्रद्धालुओं का समागम, गीत-संगीत, सामूहिक उपासना। 
कार्यक्रम के हिस्से के रूप में कन्या पूजन की परंपरा भी है — अर्थात् नवरात्रि के अंतिम दिन छोटे-छोटे बालिकाओं का पूजा-सत्कार किया जाता है। 
नवरात्रि कार्यक्रम के दौरान, VMRK केवल पूजा-उत्सव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि “मानव-सेवा” की दिशा में सक्रिय रहता है — जैसे नि:शुल्क भोजन, ठहराव, चिकित्सा शिविर, रक्तदान-कैम्प आदि। उदाहरणस्वरूप, …चैत्र नवरात्रि 2025 के दौरान 30 मार्च-7 अप्रैल के बीच मेडिकल कैंप, रक्तदान, शैक्षिक सामग्री वितरण आदि की गईं। 
इसी तरह, 2023 अक्टूबर अश्विन नवरात्रि में 61 स्कूलों में पहुँच कर 5,000+ छात्रों को शैक्षिक सामग्री प्रदान की गई। इस प्रकार, नवरात्रि सिर्फ उपवास-पूजा का समय नहीं, बल्कि आंतरिक जागृति, सेवा-प्रवृत्ति और दिव्यता-अनुभव का अवसर माना जाता है। 
प्रमुख आध्यात्मिक शिक्षाएँ
(i) “एकता-विविधता में” जीवन
संतजी का मुख्य संदेश है — “हम सब परम परिवार-रूपी ईश्वर का हिस्सा हैं, इसलिए प्रत्येक रूप में ईश्वर का सम्मान, प्रेम व सेवा करना चाहिए।” 
(ii) सेवा (Seva) को आत्मा-मार्ग बनाना
वे कहते हैं कि सेवा केवल बाह्य कर्म नहीं, बल्कि आत्म-विस्तार का माध्यम है। “जब हम मानव-सेवा करते हैं, तब हम ईश्वर-सेवा करते हैं।” उन्होंने बार-बार यह कहा है कि मानवता की सेवा जीवन का प्रेरक लक्ष्य होनी चाहिए।
‘‘दूसरों की सहायता करना, दुःखी-परित्यक्तों के प्रति संवेदनशील बनना’’ उनके संदेश का अभिन्न अंग रहा है।
(iii) प्राकृतिक जीवन-शैली एवं आत्म-शुद्धि
उनकी शिक्षाओं में एक “प्राकृतिक जीवन-शैली” पर बहुत जोर है — जैसे सादा भोजन, संयमित कार्य, ध्यान-साधना, अहिंसा/करुणा भाव। 
(iv) सच्चे गुरु-अनुयायी सम्बन्ध का महत्व
वे बताते हैं कि जैसे विद्यालय में शिक्षक आवश्यक है, वैसे ही आध्यात्मिक पथ में गुरु का होना अनिवार्य है। गुरु-शिष्य परम्परा को उन्होंने माना है कि यह केवल बाह्य गुरुकुल नहीं — बल्कि भीतर के उन्नयन का मार्ग है।
• सत्संग, सत्कर्म, सतगुरु का स्मरण — ये सब उनकी शिक्षाओं में बार-बार आये हैं। 
(v) एकता-भावना एवं धर्म-सेतु निर्माण
• भिन्न-भिन्न धर्म, संप्रदाय, भाषाओं के बीच मानव-एकता की भावना उन्होंने बढ़ाई है।
• धर्म का अर्थ सिर्फ किसी पंथ का पालन नहीं, बल्कि जीवन में सदाचार, करूणा, प्रेम और समर्पण होना चाहिए — यही उनका मूल संदेश है।
(vi) अहंकार एवं माया-बन्धनों से परे उठना
• लोग अपने अहं-मान, लालच, क्रोध आदि भावों के कारण आगे नहीं बढ़ पाते — इस पर उन्होंने विशेष जोर दिया है।
• वास्तविक आनंद, आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर-अनुभव अहं-वश नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि द्वारा संभव है।
(vii) स्व-ध्यान एवं जीने का संतुलित मार्ग
• केवल भक्ति-भाव या केवल कर्म-मार्ग नहीं, बल्कि संतुलित आध्यात्मिक जीवन का प्रयोजन है।
• साधना-ध्यान (मन को नियंत्रित करना) तथा दिन-चर्या तथा जिम्मेदारियों में स्थिरता दोनों को साथ ले चलने पर बल दिया जाता है।
 (v) आत्म-साक्षात्कार एवं चेतना-विकास
उनका उपदेश इस ओर उन्मुख है कि हमें “मैं आत्मा हूँ, अनन्त-चेतना हूँ, आनंद-स्वरूप हूँ” इस अनुभव तक पहुँचना है। 
इस दिशा में ध्यान-धारण, मौन-प्रवृत्ति, सुख-दुःख की परिपक्व दृष्टि आदि की भूमिका है।
कुछ चुने हुए वचन (संक्षिप्त)
“जब हम मानवता की सेवा करते हैं, हम ईश्वर-श्री को स्पर्श करते हैं।”
“प्रकृति-साधना से भीतर का शोर शांत हो जाता है, वहाँ से सच-चेतना जन्म लेती है।”
“गुरु-अनुयायी का सम्बन्ध केवल शिष्य-गुरु नहीं, बल्कि जीवन-शिक्षा-अनुभव का रूप लेता है।”
“एकका स्वरूप देखो — भिन्नता में बंधे मत रहो। सभी जीवों में एक चेतना बसती है।”

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